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शेर और खरगोश

Short story

एक जंगल में एक शेर प्रतिदिन किसी-न-किसी पशु को खा जाता था। वहाँ के जानवरों को बारी-बारी से उसके बुलावे पर उपस्थित होना पड़ता। जिस दिन जिसकी बारी आती, वही उसका भोजन बनता।

अंततः खरगोश की बारी आ पहुँची। उसे शेर के मुँह में जाने की कोई इच्छा न थी। वह टालता रहा, रास्ते में देर करता रहा, और जब किसी तरह साहस बटोरकर पहुँचा, तब तक शेर बहुत देर से उसकी राह देख रहा था। खरगोश दिखाई दिया, तो वह उसकी ओर झपट पड़ा।

“शेर चाचा,” खरगोश ने कहा, “मैं जानता हूँ कि मुझे देर हुई है और आपका नाराज़ होना स्वाभाविक है। लेकिन सच कहूँ तो दोष मेरा नहीं। हमारे जंगल के उस हिस्से में एक और शेर है, जो कहता है कि यहाँ का स्वामी वही है और आपकी कोई हैसियत नहीं। मैंने जब यह जताया कि मैं हर हाल में आपके पास ही आऊँगा, तब वह मुझ पर बहुत क्रोधित हुआ।”

इस कथित प्रतिद्वंद्वी का दावा सुनकर शेर दहाड़ उठा। कौन था जो अपने को उसका स्वामी कह रहा था? उसने खरगोश से कहा कि उसे तुरंत उस शेर तक पहुँचा दे। वह उसे सबक सिखाकर दिखाना चाहता था कि जंगल पर अधिकार किसका है।

खरगोश उसे साथ लेकर चला। काफ़ी लंबा रास्ता तय करने के बाद वे एक कुएँ तक पहुँचे। खरगोश ने उसके भीतर झाँककर कहा कि दूसरा शेर अभी यहीं था।

शेर ने नीचे देखा। पानी की सतह पर उसे शेर का रूप दिखाई दिया। उसे समझ नहीं आया कि वह अपना ही प्रतिबिंब देख रहा है। उसने अपनी अयाल झटकी, तो नीचे वाले शेर ने भी अयाल हिलाई। उसने गरजकर चुनौती दी, तो कुएँ की गहराई से उसी की गर्जना गूँजती हुई लौट आई। हर हरकत और हर आवाज़ उसे अपने सामने खड़े विरोधी की पुष्टि लग रही थी।

“ज़रा उसे मेरे हाथ आने दो!” वह दहाड़ा। अगले ही क्षण उसने पानी में छलाँग लगा दी। ज़ोर का छपाका सुनाई दिया और फिर उस शेर की कोई खबर नहीं मिली। जिस शत्रु पर वह झपटना चाहता था, वह तो था ही नहीं; कुएँ में केवल उसकी अपनी छवि थी। उसकी जान उसी कुएँ में चली गई।

जंगल के पशुओं ने राहत की साँस ली। अब उन्हें रोज़ किसी साथी को शेर के पास भेजने की मजबूरी से मुक्ति मिल गई थी। उन्होंने मिलकर खरगोश की जीत पर एक पद बनाया, जिसे उस जंगल में रविवार को गाया जाता था। उसमें छोटे खरगोश की बुद्धि और शेर की मूर्खता का अंतर बताया गया: खरगोश ने अपनी समझ से बाज़ी जीती, जबकि शेर मूर्खता के कारण कुएँ में गिरा और जान से हाथ धो बैठा।

शेर की ताकत इस मुकाबले में किसी काम नहीं आई। उसने पानी के दृश्य और लौटती ध्वनि को अपने विरोधी का प्रमाण मान लिया, और खरगोश को उससे लड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उसे केवल वहाँ तक ले जाना काफी था जहाँ वह अपनी ही परछाईं को शत्रु समझ बैठा।


English summary · includes the ending

A lion eats one forest animal every day. The animals must come to him in turn. When a hare is called, he delays because he does not want to be eaten. The lion is angry when he finally arrives.

The hare blames another lion in the forest. This second lion claims to rule the forest and says the first lion is nobody. Furious at the challenge, the lion demands to see his rival. The hare leads him to a well and says the other lion was there just a moment ago.

Looking into the water, the lion sees his own reflection. When he shakes his mane, the other lion does the same. When he roars, the well echoes his voice. He jumps in to attack and dies. The other animals can now live in peace. They make a song celebrating the small hare’s intelligence and the powerful lion’s foolishness.

Adapted for Lejrbål from the credited source.
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